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Shri Mahavir Chalisa Lyrics | श्री महावीर चालीसा | Download PDF

CHALISA

Jain Religion-

दोस्तों ये बात तो सर्वविदित है की जैन धर्म की महानताओं की जितनी तारीफ की जाये वो कम ही है. अहिंसा पे सर्वाधिक बल देने वाला ये धर्म अनेकों विशेषताओं से भरा हुआ है. अहिंसा के बाद इस धर्म की एक विशेषता ये भी है कि ये ज्ञान पर आधारित है न कि सिर्फ पुस्तकों पर. अर्थात विवेक ही धर्म है. जैन धर्म में 24 तीर्थंकर हुए हैं जिन्होंने विश्व को अनेकों प्रकार से अद्भुत ज्ञान प्रदान किया है.

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आज हम बात करेंगे भगवान् महावीर जी की आराधना की अर्थात भगवन महावीर चालीसा की. इस चालीसा के माध्यम से आप अपने सत्कर्मों में वृद्धि कर सकते हैं तथा मानसिक शान्ति प्राप्त कर सकते हैं.

Lord Parshvanath-

भगवान महावीर ने कहा था- “सत्य के पथ पर धैर्य रखें”  भगवान महावीर के जीवन की कहानियाँ इस तथ्य को स्पष्ट रूप से चित्रित करती हैं कि सत्य की प्राप्ति के आकांक्षी की यात्रा लंबी होती है और इस खोज में धैर्य की आवश्यकता होती है. उनका जीवन इस तथ्य को भी प्रकट करता है कि सफलता का अर्थ केवल गंतव्य का मार्ग या साधन जानना नहीं है, बल्कि लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए परिश्रम करना सफलता का एक चिन्ह है.

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आइये ऐसे महान व्यक्तित्व के लिए Shri mahavir chalisa lyrics पढ़कर शान्ति का अनुभव करें-

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Shri mahavir chalisa lyrics

यहाँ हम Shri mahavir chalisa lyrics देने जा रहे हैं उम्मीद है आप भगवन महावीर चालीसा को अवश्य सच्चे मन से पढ़कर प्रभु महावीर से प्रेरणा लेंगे –

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Shri mahavir chalisa lyrics in Hindi

दोहा

शीश नवा अरिहन्त को, सिद्धन करूँ प्रणाम।

उपाध्याय आचार्य का, ले सुखकारी नाम।

सर्व साधु और सरस्वती, जिन मन्दिर सुखकार।

महावीर भगवान को, मन-मन्दिर में धार।

चौपाई

जय महावीर दयालु स्वामी, वीर प्रभु तुम जग में नामी।

वर्धमान है नाम तुम्हारा, लगे हृदय को प्यारा प्यारा।

शांति छवि और मोहनी मूरत, शान हँसीली सोहनी सूरत।

तुमने वेश दिगम्बर धारा, कर्म-शत्रु भी तुम से हारा।

क्रोध मान अरु लोभ भगाया, माया -मोह तुमसे डर खाया।

तू सर्वज्ञ सर्व का ज्ञाता, तुझको दुनिया से क्या नाता।

तुझमें नहीं राग और द्वेष, वीतराग तू हितोपदेश।

तेरा नाम जगत में सच्चा, जिसको जाने बच्चा बच्चा।

भूत प्रेत तुम से भय खावें, व्यन्तर राक्षस सब भग जावें।

महा व्याध मारी न सतावे, महा विकराल काल डर खावें ।

काल नाग होय फन धारी, या हो शेर भयंकर भारी।

ना हो कोई बचाने वाला, स्वामी तुम्हीं करो प्रतिपाला।

अग्नि दवानल सुलग रही हो, तेज हवा से भड़क रही हो।

नाम तुम्हारा सब दुख खोवे, आग एकदम ठण्डी होवे।

हिंसामय था जग विस्तारा , तब तुमने कीना निस्तारा।

जनम लिया कुण्डलपुर नगरी, हुई सुखी तब प्रजा सगरी।

सिद्धारथ जी पिता तुम्हारे, त्रिशला के आँखों के तारे।

छोड़ सभी झंझट संसारी, स्वामी आप बाल-ब्रह्मचारी।

पंचम काल महा-दुखदाई, चाँदनपुर महिमा दिखलाई।

टीले में अतिशय दिखलाया, एक गाय का दूध गिराया।

सोच हुआ मन में ग्वाले के, पहुँचा एक फावड़ा लेके।

सारा टीला खोद गिराया , तब तुमने दर्शन दिखलाया।

जोधराज को दुख ने घेरा, उसने नाम जपा तब तेरा।

ठंडा हुआ तोप का गोला, तब सब ने जयकारा बोला।

मंत्री ने मन्दिर बनवाया, राजा ने भी द्रव्य लगाया।

बड़ी धर्मशाला बनवाई, तुमको लाने को ठहराई।

तुमने तोड़ी बीसों गाड़ी, पहिया खसका नहीं अगाड़ी।

ग्वाले ने जो हाथ लगाया, फिर तो रथ चलता ही पाया।

पहिले दिन बैशाख बदी के, रथ जाता है तीर नदी के।

मीना गूजर सब ही आते, नाच-कूद सब चित उमगाते।

स्वामी तुमने प्रेम निभाया, ग्वाले का बहु मान बढ़ाया।

हाथ लगे ग्वाले का जब ही, स्वामी रथ चलता है तब ही।

मेरी है टूटी सी नैया, तुम बिन कोई नहीं खिवैया।

मुझ पर स्वामी जरा कृपा कर, मैं हूँ प्रभु तुम्हारा चाकर।

तुम से मैं अरु कछु नहीं चाहूँ, जन्म-जन्म तेरे दर्शन पाऊँ।

चालीसे को चन्द्र बनावे, बीर प्रभु को शीश नवावे।

सोरठा

नित चालीसहि बार, पाठ करे चालीस दिन।

खेय सुगन्ध अपार, वर्धमान के सामने।।

होय कुबेर समान, जन्म दरिद्री होय जो।

जिसके नहिं संतान, नाम वंश जग में चले।।

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