जान लें जन्म से मृत्यु तक मनुष्य को मिलने वाली सजाएं भगवत पुराण में क्या-क्या सजाएँ लिखी हैं।

जान लें  जन्म से मृत्यु तक मनुष्य को मिलने वाली सजाएं | भगवत पुराण में क्या-क्या सजाएँ लिखी हैं।

Dharma Karma

आज हम आपको इस पोस्ट में बता रहे हैं कि मनुष्य को माता के गर्भ से मृत्यु तक किस – किस तरह के कष्ट भोगने पड़ते हैं जिसका वर्णन भागवद पुराण में किया गया है।

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जन्म से मृत्यु तक मनुष्यों को क्या क्या सजाएँ मिलती है? Punishments From Life to Death

अन्य सभी होने की अपेक्षा में मनुष्य योनि में सबसे ज्यादा कष्ट भोगने पड़ते हैं

मित्रों जैसा कि हम सभी जानते हैं कि इस मृत्युलोक अर्थात पृथ्वीलोक पर जीव जंतुओं की 8400000 योनियां निवास करती हैं, और उसी में से एक मनुष्य योनि भी है जिससे हमारा और आपका जन्म हुआ है तो हमने आपको अपनी कई पोस्टों में बताया है कि मृत्यु के बाद प्राणी को उसके कर्मों के हिसाब से अगला जन्म मिलता है और जब कोई प्राणी अपने पिछले जन्म में अधिक से अधिक सत्कर्म करता है तो उसका जन्म मनुष्य योनि में होता है परन्तु मित्रों धर्मशास्त्र की मानें तो अन्य सभी योनियों की अपेक्षा जीव को मनुष्य योनी में ही सबसे ज्यादा कष्ट भोगना पड़ता है।

मृत्यु के बाद मनुष्य की योनि में जन्म

जब भी कोई प्राणी मृत्यु के बाद मनुष्य की योनि में जन्म लेता है तो वह सब से पहले ईश्वर द्वारा निश्चित पुरुष की वीर्य कण के रूप में स्त्री के उधर में प्रवेश करता है वहाँ वह एक रात्री में स्त्री के रस में मिलकर एक बच जाता है फिर 5 रात्रि में छोटे कण का रूप हो जाता है और उसके बाद अंडे की जैसे रूप में परिणित हो जाता है इसी तरह एक महीने में उसके सर निकल आते हैं दो महीने में हाथ पाव आदि अंगों का निर्माण हो जाता है और तीन महीने में नख अर्थात नाखून, अस्थि, त्वचा, स्त्री पुरुष के चिन्ह तथा अन्य छिद्र उत्पन्न हो जाते हैं।

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कौन से महीने में गर्भ में पल रहे शिशु को भूख प्यास लगने लगती हैं

चार महीने में उसमें मांस उत्पन्न होने लगता है फिर 5 महीने में गर्भ में पल रहे शिशु को भूख, प्यास लगने लगती है और छटे महीने से झिल्ली से लिपटकर वह कोख में वह घूमने लगता है उस समय माताजी द्वारा ग्रहण किए हुए अन्न, जलआदि से उसकी भूख मिटने लगती है और वह क्रमी आदि जन्तुओं के उत्पत्ति स्थान में पड़ा रहता है।

गर्भ में पल रहे शिशु को सारे शरीर में पीड़ा क्यों होते हैं

गर्भ में पल रहा शिशु सुकुमार तो होता ही है जो वहां की भूखे कीड़े उसके अंग नोचते हैं तब अत्यंत क्लेश के कारण वह क्षण क्षण में अक्षेत हो जाता है इतना ही नहीं माता के खाए हुए कड़वे, तीखे, गर्म, नमकीन, रूखे और खट्टे आदि पदार्थों का स्पर्श होने से उसके सारे शरीर में पीढ़ा होने लगती है वह जीव माता के गर्भाशय में झिल्ली से लिपटा और आँतों से घिरा रहता है उसका सिर पेट की ओर और पीठ और गर्दन कुंडलाकार मुड़ेरहते हैं माता के गर्भ में मनुष्य पिंजरे में बंद पक्षी की भाँती पराधीन एवं अंगों को हिलाने डुलाने में भी असमर्थ रहता है

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स्थूल शरीर में बंधा हुआ जीव हाथ जोड़कर प्रभु की स्तुति क्यों करता है

इस अवस्था में उसे दिव्य शक्ति के द्वारा स्मरण शक्ति प्राप्त होती है जिसके बाद उसे अपने पिछले जन्मों के कर्मों याद आ जाते हैं फिर वह बेचैन हो जाता है और उसका दम घुटने लगता है फिर सातवां महीना आरंभ होने पर उसमें ज्ञान शक्ति भी पर पनपने लगती है जिसकी वजह से वह एक स्थान पर नहीं रहना चाहता तब स्थूल शरीर में बंधा हुआ वह जीव अत्यंत भयभीत होकर दीर्घवाणी से कृपा याचना करता हुआ हाथ जोड़कर उस प्रभु की स्तुति करता है जिसने उसे माता के गर्भ में डाला है।

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माता के गर्भ में उपस्थित जीव प्रभु से याचना कैसे करता है

माता के गर्भ में उपस्थित जीव प्रभु से यह याचना करता है कि हे प्रभु माना मैं बड़ा अधर्म हूं, माना मैं बड़ा अधर्मी हूं, माना में बड़ा अदम हूँ, मैं बड़ा पापी हूं, और आपने जो यह गति दिखाई है वह मेरे ही योग्य है वह शरीर से रहित होने पर भी देखने में पंच भौतिक शरीर से संबंध हो और इस लिए इंद्रिय गुण शब्द आदि विषय और विधाभास्अर्थात अहंकार रुक जान पड़ता हूं इसके बाद भागवत पुराण में बताया गया है देहधारी जीव दूसरे देह अर्थात मां की गर्व के भीतर मलमूत्र और रूधर की कुएं में घिरा हुआ रहता है. उसके पाचन रस की ऊष्मा से गर्भ में मौजूद जीव का शरीर अत्यंत संत्रप्त होता रहता है।इन कष्टों के बारे में सोचते हुए जीव गर्भ से बाहर निकलने की प्रबल इच्छा लिए महीने गिन रहा होता है और भगवान से प्रार्थना करता रहता है कि हे भगवान मुझ दीन को यहां से कब निकाला जाए गा घर में मौजूद मनुष्य सोचता है कि पशु पक्षी आदि अन्य जीव तो अपनी मूढ़ बुद्धि के अनुसार अपने शरीर में होने वाले सुख दुख आदि का ही अनुभव करते हैं किंतु मैं तोभगवान आपकी कृपा से एक सा धन संपन्न शरीर से युक्त हुआ हूं अतः आपकी दी हुई विवेक बुद्धि से अपने शरीर के बाहर और भीतर अहंकार रूपी आत्मा का अनुभव करता हूं‌।

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शिशु माता के गर्भ से मृत्युलोक में जब आता है

भगवन इस अत्यंत दुःख से भरे हुए गर्भाशय में यद्धपि मैं बड़े कष्ट से रह रहा हूं तो भी इससे बाहर निकलकर संसार में अंधकूप में गिरने की मुझे बिल्कुल इच्छा नहीं है क्योंकि उसमे जानेवाली जीव को आपकी माया घेर लेती है जिसके कारण उसके शरीर में अहंकार बुद्धि हो जाती है और उसके परिणाम में उसे फिर इस संसार चक्र में ही रहना होता है इसलिए वह भगवान से बार-बार विनती करता रहता है कि वे उसे इस कष्ट से और सांसारिक मोह माया से जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी मुक्ति दे दें फिर नवें या दसवें महीने में जब मनुष्य अपनी माता के गर्भ से इस मृत्युलोक में आता है तो वह उसकी सारी स्मृति नष्ट हो जाती है वह विपरीत गति को प्राप्त होकर बार बार जोर जोर से रोने लगता है फिर माता-पिता के द्वारा उसका पालन पोषण किया जाता है।

शिशु अवस्था में मिलने वाले कष्ट

शिशु अवस्था में जब मनुष्य को खाट पर सुला दिया जाता है तो उसे खटमल आदि जैसे कई कीड़े काटते रहते हैं लेकिन तब उसमें शरीर को खुजलाने, उठाने अथवा करवट बदलने की भी सामर्थ्यन होने के कारण वह बड़ा कष्ट पाता है उसकी त्वचा बड़ी कोमल होती है इसलिए वह शिवा रोने के कुछ नहीं कर सकता। इसी तरह मनुष्य वाल्यावस्था के दुःख भोगकर युवा अवस्था में पहुंचता है।

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युवाअवस्था

युवा अवस्था के समय उसे यदि कोई इच्छित भोग नहीं प्राप्त होता तो अज्ञानता वश उसका क्रोध बढ़ जाता है और वह शोकाकुल हो जाता है देह के साथ ही साथ अभिभान और क्रोध बढ़ जाने के कारण मनुष्य अपना ही नाश करने के लिए दूसरेकाम ही पुरुषों के साथ बैर कर लेता है इतना ही नहीं खोटी बुद्धि और अज्ञानता के कारण मनुष्य में मेरे पन का अभिमानकरने लगता है।

Bhagwat Puran Punishments – Mrityulok Mein Milne Waali Sazaayen

मनुष्य का बार-बार संसार चक्र में जन्म

जो शरीर से मृत्यु काल तक अनेक प्रकार के कष्ट ही देता है उसी के लिए मनुष्य तरह-तरह के कर्म करता रहता है जिनमे बंध जाने के कारण इसे बार-बार संसार चक्र में जन्म लेना पड़ता है इतना ही नहीं मनुष्य योनि में जन्म लेने के बाद यदि किसी मनुष्य का भोगों में लगे हुएविषयी पुरुषों से समागम हो जाता है और वह उसी काअनुगमन करने लगता है तो पहले के समा नही वह फिर नारकी योनि में जन्म लेता है जिसके संग मनुष्य की पवित्रता, दया, वाणी का संयम, बुद्धि और इंद्रियों का संयम जैसे सब गुण नष्ट हो जाते हैं।

मनुष्य को किसके साथ मित्रता नहीं करनी चाहिए

भागवत पुराण में बताया गया है कि किसी भी मनुष्य को ऐसे लोगों के साथ मित्रता नहीं करनी चाहिए जो हमेशा स्त्रियों के साथ समागम में रुक्त रहता हो अशांत और वह अर्थात मूर्ख हो क्योंकि जीव को किसी और का संग करने से ऐसा मोह और बंधन नहीं होता जैसा स्त्री और स्त्रियों की संघियों का संघकरने से होता है।

जब परमपिता ब्रह्मा ही रूप लावण्य से मोहित हो गए थे

इससे जुड़ी एक कथा में बताया गया है कि एक बार परमपिता ब्रह्माजी अपनी पुत्री सरस्वती को देखकर उसके रूपलावण्य से मोहित हो गए थे और उसके मृगी रूप में भागने पर उसके पीछे निर्लज्जता पूर्वक मृग रूप होकर दौड़ने लगे इसलिए ऐसा कौन सा पुरुष हो सकता है जिसकी बुद्धि स्त्री रूपड़ी माया से मोहितन हो इतना ही नही स्त्री रूपड़ी माया में इतना बल है कि वह अपने भ्रकुटी अर्थात नयन से बड़े-बड़े दिग्विजयी वीरों को पैरों से कुचल देती है।

कैसे पुरुष के लिए नर्क का खुला द्वार बताया गया है

जो पुरुष योग्य के परम पथ पर आरोग्य होना चाहता हो अथवा जिसे मेरी सेवा के प्रभाव से आत्मा , अनात्मा कभी भी खो गया हो वह स्त्रियों का संघ कभी ना करें क्योंकि उन्हें ऐसे पुरुष के लिए नर्क का खुला द्वार बताया गया है।

जन्म से मृत्यु तक मनुष्य को मिलने वाली सजाएँ  – मृत्युलोक में मिलने वाली सजाएँ

जब मनुष्य स्त्री में आसक्त रहता है

जो मनुष्य अपने जीवन में इस स्त्री में आसक्त रहता है तथा मृत्यु के समय भी स्त्री का ही ध्यान करता है उसे अगले जन्म मेंस्त्री योनी प्राप्त होती है।

जब मनुष्य किसी चीज की हत्या करता है

मनुष्य रूपी जीवन पाकर यदि कोई मनुष्य जिस किसी भी जीव की हत्या अपने भौतिक सुखों को प्राप्त करने के लिए करता है उसे अगले जन्म में उसे जीव की योनि में जन्म लेकर कष्ट भोगना पड़ता है।

जब मनुष्य अंतिम पड़ाव में प्रवेश करता है

फिर मनुष्य की उनकी उम्र जब डलने लगती है अर्थात जब वह अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में प्रवेश करता है तो उसे इसजन्म में किए गए तब तक के कर्मों के हिसाब से इसी मृत्युलोक पर शारीरिक और मानसिक पीड़ा भोगनी पड़ती है।

जब मनुष्य अपने मां-बाप की बुढ़ापे में सेवा नहीं करता है

अर्थात यदि कोई मनुष्य अपने मां-बाप की बुढ़ापे में सेवा नहीं करता या फिर उसे घर से निकाल देता है तो उसकी सन्तान भी बुढ़ापे में उसके साथ वैसा ही व्यवहार करती है जैसा उसने अपने मां-बाप के साथ किया था और यह जीवन चक्र निरंतर चलता रहता है।

जब मनुष्य मृत्युशैया पर होता है

जब मनुष्य मृत्युशैया पर होता है तो उसे मां के गर्भ की तरह ही एक बार फिर दिव्य शक्ति मिलती है और उसे अपने कई जन्मों के कर्म याद आ जाते हैं जिसे जानने के बाद मनुष्य पुनःविलाप करने लगता है और भगवान से यह बार-बार विनती करता है कि हे प्रभु इस कष्टरूपी जीवन चक्र से मुझे कब मुक्ति मिलेगी मैं ऐसा क्या करूं जिससे मुझे आपकेचरणों में शरण मिल सके. उस समय वह अपने द्वारा किए गए बुरे कर्मों को याद कर बार-बार रोता भी है।

Bhagwat Puran Sazaayen – Sazaayen Hinduism

वह सोचता है कि मैं अपने कर्मों के बारे में अपने परिवार वालों को बता देता हूं किन्तु वह ऐसा नहीं कर पाता तब भगवान उस से कहते हैं कि तुम्हारे पास जब अच्छे कर्म करने का वक्त था उस समय तुम लोभ,  काम, क्रोध, से आसक्त हो बुरे काम कर रहे थेऔरअब जब तुम्हें कष्ट भोगना पड़ रहा है तो तुम मुझ से मुक्ति की आस करते हो ऐसा कभी नहीं हो सकता इसलिए हे देह धारी अपने अगले जन्म मेंअच्छेकर्म कर ना ताकि तुम्हें मेरी शरण में जगह मिल सके फिर इसके बाद यमदूत उसके शरीर से आत्मा निकाल कर ले जाते हैं और बच जाता है स्थूल शरीर।

इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह भगवान के द्वारा मिले मनुष्य रुपी जीवन में अधिक से अधिक सत्कर्म कर जन्म मृत्यु केचक्र से खुद को मुक्ति दिला ले और सदा के लिए भगवान के चरणों में अपना स्थान बना लें।