brihaspati brihaspativar vrat katha in hindi guruwar niyam fast vidhi benefits food pdf download hellozindgi.com

Brihaspativar Vrat katha| गुरुवार व्रत कथा | नियम | विधि | लाभ | PDF

Dharmik Chalisa & Katha

इस लेख के विषय में

सर्वप्रथम सभी प्रेम से बोलो विष्णु भगवन की जय दोस्तों Brihaspativar Vrat में दो कथाएँ पढने का प्रचलन है जिसमें एक ब्रहस्पतिवार व्रत कथा है तथा दूसरी है ब्रहास्पतिदेव की कथा. भक्त Brihaspativar Vrat Katha पढ़ कर भी व्रत पूजन कर सकते हैं. यहाँ हम दोनों कथाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं, कृपया इस पोस्ट को ध्यान से पढ़ें. इस पोस्ट में Brihaspativar Vrat कथा दी जा रही है तथा दूसरी कथा ब्रहास्पतिदेव की कथा का लिंक पहली कथा के अंत में दिया हुआ है. अगर भक्त दोनों कथाएँ पढ़ते हैं तो अति उत्तम माना जाता है.

Also Read:-

Solah Somvar Vrat Katha in Hindi (सोलह सोमवार व्रत नियम, व्रत विधि)- Benefits & Lyrics

इन दोनों कथाओं के साथ ही साथ कुछ सम्बंधित जानकारियाँ भी आप के साथ साझा करेंगे जो आपका जीवन सफल बनाने में आपकी मदद करेंगी. इसी के साथ कुछ ऐसी महत्वपूर्ण सूचनाएं भी प्रस्तुत करेंगे जो guruwar vrat katha in hindi पढने वालों के लिए जाननी अत्यंत आवश्यक हैं.

Brihaspati Dev

पौराणिक कथाओं के अनुसार वृहस्पति भगवान अर्थात Lord Brihaspati– देवताओं के गुरु होने के साथ साथ पवित्र ज्ञान एवं  आकर्षण के भी देवता माने गए हैं. कुछ मान्यताओं के अनुसार इन्हें भजन एवं संस्कार के स्वामी भी कहा जाता है. जब देवताओं एवं असुरों के मध्य युद्ध हुआ था तो भगवन ब्रहस्पति brihaspati bhagwan ने इंद्र के सलाहकार की भूमिका निभायी थी.

Also Read:-

Somvar Vrat Katha in Hindi – Benefits & Lyrics

देवताओं के गुरु हैं भगवान ब्रहस्पति

इतना ही नहीं भगवान बृहस्पति को प्रार्थना एवं भक्ति का भी स्वामी कहा जाता है. इन्हें देवताओं के गुरु होने का भी दर्जा प्राप्त है. इसी के साथ इन्हें शील एवं धर्म का अवतार भी कहा जाता है. इनका एक कार्य देवताओं एवं मनुष्यों के बीच मध्यस्थता करना भी है. Thursday Fast Katha in Hindi इसीलिए कहा जाता है कि इनके भक्तों पे किसी प्रकार का अभाव नहीं रहता. यदि प्रथ्वी लोक में कुछ परेशानियाँ झेलनी भी पद जायें तो अवश्य ही भक्तों को बैकुंठ की प्राप्ति होती है. भगवन ब्रहस्पति को प्रसन्न करने का एक सरल उपाय है veervar ki katha.

तो आइये देखते हैं कि thursday vrat katha किस प्रकार है-

GURUDEV BRAHASPATI LORD BRAHASPATI BHAGWAN BRAHASPATI JI HELLOZINDGI.COM

Guruvar Vrat ke Niyam

Thursday Fast Rules in Hindi–  ब्रहस्पतिवार या यूं कहें कि गुरुवार का दिन प्रभु विष्णु को समर्पित होता है. गुरुवार के दिन भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए भक्तगण उनकी पूजा एवं व्रत करते हैं . कहा जाता है कि पूरे मन से भगवान विष्णु की पूजा करने पर भगवान ब्रहस्पति सारी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं.  इतना ही नहीं बल्कि दुख एवं विपत्तियों को सदैव के लिए नष्ट कर देते हैं. भक्तगण ये जान लें कि विष्णु जी को पीला वस्त्र अत्यधिक प्रिय  है. अगर भक्त विष्णु जी की पूजा आराधना करते हैं, तो पीत वस्त्र अवश्य धारण करें.

विशेष ध्यान रखें

ज्ञात रहे कि सभी कार्यों में शीघ्र सफलता प्राप्त करने के लिए विष्णु जी की पूजा एवं आराधना नियम के साथ करनी चाहिए. इस पोस्ट में आगे जानते हैं कि विष्णु जी को प्रसन्ना करने के लिए पूजा एवं आराधना के दौरान किन-किन बातों पर विशेष ध्यान देना  चाहिए.

Also Read:-

Sai Chalisa in hindi – Lyrics

Brihaspativar Vrat Katha in Hindi  

॥ अथ श्री बृहस्पतिवार व्रत कथा ॥

भारतवर्ष में एक प्रतापी और दानी राजा राज्य करता था. वह नित्य गरीबों और ब्राह्मणों की सहायता करता था. यह बात उसकी रानी को अच्छी नहीं लगती थी, वह न ही गरीबों को दान देती, न ही भगवान का पूजन करती थी और राजा को भी दान देने से मना किया करती थी.

एक दिन राजा शिकार खेलने वन को गए हुए थे, तो रानी महल में अकेली थी. उसी समय बृहस्पतिदेव साधु वेष में राजा के महल में भिक्षा के लिए गए और भिक्षा माँगी रानी ने भिक्षा देने से इन्कार किया और कहा: हे साधु महाराज मैं तो दान पुण्य से तंग आ गई हूं. मेरा पति सारा धन लुटाते रहिते हैं. मेरी इच्छा है कि हमारा धन नष्ट हो जाए फिर न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी.

साधु ने कहा: देवी तुम तो बड़ी विचित्र हो। धन, सन्तान तो सभी चाहते हैं. पुत्र और लक्ष्मी तो पापी के घर भी होने चाहिए. यदि तुम्हारे पास अधिक धन है तो भूखों को भोजन दो, प्यासों के लिए प्याऊ बनवाओ, मुसाफिरों के लिए धर्मशालाएं खुलवाओ. जो निर्धन अपनी कुंवारी कन्याओं का विवाह नहीं कर सकते उनका विवाह करा दो. ऐसे और कई काम हैं जिनके करने से तुम्हारा यश लोक-परलोक में फैलेगा.

परन्तु रानी पर उपदेश का कोई प्रभाव न पड़ा. वह बोली: महाराज आप मुझे कुछ न समझाएं. मैं ऐसा धन नहीं चाहती जो हर जगह बाँटती फिरूं.

साधु ने उत्तर दिया यदि तुम्हारी ऐसी इच्छा है तो तथास्तु! तुम ऐसा करना कि बृहस्पतिवार को घर लीपकर पीली मिट्‌टी से अपना सिर धोकर स्नान करना, भट्‌टी चढ़ाकर कपड़े धोना, ऐसा करने से आपका सारा धन नष्ट हो जाएगा. इतना कहकर वह साधु महाराज वहाँ से आलोप हो गये.

साधु के अनुसार कही बातों को पूरा करते हुए रानी को केवल तीन बृहस्पतिवार ही बीते थे, कि उसकी समस्त धन-संपत्ति नष्ट हो गई. भोजन के लिए राजा का परिवार तरसने लगा.

तब एक दिन राजा ने रानी से बोला कि हे रानी, तुम यहीं रहो, मैं दूसरे देश को जाता हूं, क्योंकि यहाँ पर सभी लोग मुझे जानते हैं. इसलिए मैं कोई छोटा कार्य नहीं कर सकता. ऐसा कहकर राजा परदेश चला गया. वहाँ वह जंगल से लकड़ी काटकर लाता और शहर में बेचता. इस तरह वह अपना जीवन व्यतीत करने लगा. इधर, राजा के परदेश जाते ही रानी और दासी दुःखी रहने लगी.

एक बार जब रानी और दासी को सात दिन तक बिना भोजन के रहना पड़ा, तो रानी ने अपनी दासी से कहा: हे दासी! पास ही के नगर में मेरी बहिन रहती है. वह बड़ी धनवान है. तू उसके पास जा और कुछ ले आ, ताकि थोड़ी-बहुत गुजर-बसर हो जाए. दासी रानी की बहिन के पास गई.

उस दिन गुरुवार था और रानी की बहिन उस समय बृहस्पतिवार व्रत की कथा सुन रही थी. दासी ने रानी की बहिन को अपनी रानी का संदेश दिया, लेकिन रानी की बड़ी बहिन ने कोई उत्तर नहीं दिया. जब दासी को रानी की बहिन से कोई उत्तर नहीं मिला तो वह बहुत दुःखी हुई और उसे क्रोध भी आया. दासी ने वापस आकर रानी को सारी बात बता दी. सुनकर रानी ने अपने भाग्य को कोसा.

Also Read:-

DHARM SANSAR

उधर, रानी की बहिन ने सोचा कि मेरी बहिन की दासी आई थी, परंतु मैं उससे नहीं बोली, इससे वह बहुत दुःखी हुई होगी.

कथा सुनकर और पूजन समाप्त करके वह अपनी बहिन के घर आई और कहने लगी: हे बहिन! मैं बृहस्पतिवार का व्रत कर रही थी. तुम्हारी दासी मेरे घर आई थी परंतु जब तक कथा होती है, तब तक न तो उठते हैं और न ही बोलते हैं, इसलिए मैं नहीं बोली. कहो दासी क्यों गई थी?

रानी बोली: बहिन, तुमसे क्या छिपाऊं, हमारे घर में खाने तक को अनाज नहीं था. ऐसा कहते-कहते रानी की आंखें भर आई.उसने दासी समेत पिछले सात दिनों से भूखे रहने तक की बात अपनी बहिन को विस्तार पूर्वक सुना दी.

रानी की बहिन बोली: देखो बहिन! भगवान बृहस्पतिदेव सबकी मनोकामना को पूर्ण करते हैं. देखो, शायद तुम्हारे घर में अनाज रखा हो.

पहले तो रानी को विश्वास नहीं हुआ पर बहिन के आग्रह करने पर उसने अपनी दासी को अंदर भेजा तो उसे सचमुच अनाज से भरा एक घड़ा मिल गया. यह देखकर दासी को बड़ी हैरानी हुई.

दासी रानी से कहने लगी: हे रानी! जब हमको भोजन नहीं मिलता तो हम व्रत ही तो करते हैं, इसलिए क्यों न इनसे व्रत और कथा की विधि पूछ ली जाए, ताकि हम भी व्रत कर सकें. तब रानी ने अपनी बहिन से बृहस्पतिवार व्रत के बारे में पूछा.

उसकी बहिन ने बताया, बृहस्पतिवार के व्रत में चने की दाल और मुनक्का से विष्णु भगवान का केले की जड़ में पूजन करें तथा दीपक जलाएं, व्रत कथा सुनें और पीला भोजन ही करें. इससे बृहस्पतिदेव प्रसन्न होते हैं. व्रत और पूजन विधि बताकर रानी की बहिन अपने घर को लौट गई.

सात दिन के बाद जब गुरुवार आया, तो रानी और दासी ने व्रत रखा. घुड़साल में जाकर चना और गुड़ लेकर आईं. फिर उससे केले की जड़ तथा विष्णु भगवान का पूजन किया. अब पीला भोजन कहाँ से आए इस बात को लेकर दोनों बहुत दुःखी थे. चूंकि उन्होंने व्रत रखा था, इसलिए बृहस्पतिदेव उनसे प्रसन्न थे. इसलिए वे एक साधारण व्यक्ति का रूप धारण कर दो थालों में सुन्दर पीला भोजन दासी को दे गए। भोजन पाकर दासी प्रसन्न हुई और फिर रानी के साथ मिलकर भोजन ग्रहण किया.

उसके बाद वे सभी गुरुवार को व्रत और पूजन करने लगी. बृहस्पति भगवान की कृपा से उनके पास फिर से धन-संपत्ति आ गई, परंतु रानी फिर से पहले की तरह आलस्य करने लगी.

Also Read:-

Shri shiv Chalisa in Hindi – Benefits & Lyrics

तब दासी बोली: देखो रानी! तुम पहले भी इस प्रकार आलस्य करती थी, तुम्हें धन रखने में कष्ट होता था, इस कारण सभी धन नष्ट हो गया और अब जब भगवान बृहस्पति की कृपा से धन मिला है तो तुम्हें फिर से आलस्य होता है.

रानी को समझाते हुए दासी कहती है कि बड़ी मुसीबतों के बाद हमने यह धन पाया है, इसलिए हमें दान-पुण्य करना चाहिए, भूखे मनुष्यों को भोजन कराना चाहिए, और धन को शुभ कार्यों में खर्च करना चाहिए, जिससे तुम्हारे कुल का यश बढ़ेगा, स्वर्ग की प्राप्ति होगी और पित्र प्रसन्न होंगे. दासी की बात मानकर रानी अपना धन शुभ कार्यों में खर्च करने लगी, जिससे पूरे नगर में उसका यश फैलने लगा.

बृहस्पतिवार व्रत कथा के बाद श्रद्धा के साथ आरती की जानी चाहिए. इसके बाद प्रसाद बांटकर उसे ग्रहण करना चाहिए.

एक दिन दुःखी होकर जंगल में एक पेड़ के नीचे आसन जमाकर बैठ गया. वह अपनी दशा को याद करके व्याकुल होने लगा. बृहस्पतिवार का दिन था, एकाएक उसने देखा कि निर्जन वन में एक साधु प्रकट हुए. वह साधु वेष में स्वयं बृहस्पति देवता थे.

लकड़हारे के सामने आकर बोले: हे लकड़हारे! इस सुनसान जंगल में तू चिन्ता मग्न क्यों बैठा है?

लकड़हारे ने दोनों हाथ जोड़ कर प्रणाम किया और उत्तर दिया: महात्मा जी! आप सब कुछ जानते हैं, मैं क्या कहूँ. यह कहकर रोने लगा और साधु को अपनी आत्मकथा सुनाई.

महात्मा जी ने कहा: तुम्हारी स्त्री ने बृहस्पति के दिन बृहस्पति भगवान का निरादर किया है जिसके कारण रुष्ट होकर उन्होंने तुम्हारी यह दशा कर दी. अब तुम चिन्ता को दूर करके मेरे कहने पर चलो तो तुम्हारे सब कष्ट दूर हो जायेंगे और भगवान पहले से भी अधिक सम्पत्ति देंगे. तुम बृहस्पति के दिन कथा किया करो. दो पैसे के चने मुनक्का लाकर उसका प्रसाद बनाओ और शुद्ध जल से लोटे में शक्कर मिलाकर अमृत तैयार करो. कथा के पश्चात अपने सारे परिवार और सुनने वाले प्रेमियों में अमृत व प्रसाद बांटकर आप भी ग्रहण करो. ऐसा करने से भगवान तुम्हारी सब मनोकामनाएँ पूरी करेंगे.

साधु के ऐसे वचन सुनकर लकड़हारा बोला: हे प्रभो! मुझे लकड़ी बेचकर इतना पैसा नहीं मिलता, जिससे भोजन के उपरान्त कुछ बचा सकूं. मैंने रात्रि में अपनी स्त्री को व्याकुल देखा है. मेरे पास कुछ भी नहीं जिससे मैं उसकी खबर मंगा सकूं.

साधु ने कहा: हे लकड़हारे! तुम किसी बात की चिन्ता मत करो। बृहस्पति के दिन तुम रोजाना की तरह लकड़ियाँ लेकर शहर को जाओ. तुमको रोज से दुगुना धन प्राप्त होगा, जिससे तुम भली-भांति भोजन कर लोगे तथा बृहस्पतिदेव की पूजा का सामान भी आ जायेगा.

इतना कहकर साधु अन्तर्ध्यान हो गए. धीरे-धीरे समय व्यतीत होने पर फिर वही बृहस्पतिवार का दिन आया. लकड़हारा जंगल से लकड़ी काटकर किसी शहर में बेचने गया, उसे उस दिन और दिन से अधिक पैसा मिला. राजा ने चना गुड आदि लाकर गुरुवार का व्रत किया। उस दिन से उसके सभी क्लेश दूर हुए, परन्तु जब दुबारा गुरुवार का दिन आया तो बृहस्पतिवार का व्रत करना भूल गया. इस कारण बृहस्पति भगवान नाराज हो गए.

उस दिन उस नगर के राजा ने विशाल यज्ञ का आयोजन किया तथा शहर में यह घोषणा करा दी कि कोई भी मनुष्य अपने घर में भोजन न बनावे न आग जलावे समस्त जनता मेरे यहाँ भोजन करने आवे. इस आज्ञा को जो न मानेगा उसे फाँसी की सजा दी जाएगी. इस तरह की घोषणा सम्पूर्ण नगर में करवा दी गई.

राजा की आज्ञानुसार शहर के सभी लोग भोजन करने गए. लेकिन लकड़हारा कुछ देर से पहुँचा इसलिए राजा उसको अपने साथ घर लिवा ले गए और ले जाकर भोजन करा रहे थे तो रानी की दृष्टि उस खूंटी पर पड़ी जिस पर उसका हार लटका हुआ था. वह वहाँ पर दिखाई नहीं दिया. रानी ने निश्चय किया कि मेरा हार इस मनुष्य ने चुरा लिया है. उसी समय सिपाहियों को बुलाकर उसको कारागार में डलवा दिया.

जब लकड़हारा कारागार में पड़ गया और बहुत दुःखी होकर विचार करने लगा कि न जाने कौन से पूर्व जन्म के कर्म से मुझे यह दुःख प्राप्त हुआ है, और उसी साधु को याद करने लगा जो कि जंगल में मिला था.

उसी समय तत्काल बृहस्पतिदेव साधु के रूप में प्रकट हुए और उसकी दशा को देखकर कहने लगे: अरे मूर्ख! तूने बृहस्पतिदेव की कथा नहीं करी इस कारण तुझे दुःख प्राप्त हुआ है. अब चिन्ता मत कर बृहस्पतिवार के दिन कारागार के दरवाजे पर चार पैसे पड़े मिलेंगे. उनसे तू बृहस्पतिदेव की पूजा करना तेरे सभी कष्ट दूर हो जायेंगे.

बृहस्पति के दिन उसे चार पैसे मिले. लकड़हारे ने कथा कही उसी रात्रि को बृहस्पतिदेव ने उस नगर के राजा को स्वप्न में कहा: हे राजा! तूमने जिस आदमी को कारागार में बन्द कर दिया है वह निर्दोष है. वह राजा है उसे छोड़ देना। रानी का हार उसी खूंटी पर लटका है. अगर तू ऐसा नही करेगा तो मैं तेरे राज्य को नष्ट कर दूंगा.

इस तरह रात्रि के स्वप्न को देखकर राजा प्रातःकाल उठा और खूंटी पर हार देखकर लकड़हारे को बुलाकर क्षमा मांगी तथा लकड़हारे को योग्य सुन्दर वस्त्र-आभूषण देकर विदा कर दिया. बृहस्पतिदेव की आज्ञानुसार लकड़हारा अपने नगर को चल दिया.

राजा जब अपने नगर के निकट पहुँचा तो उसे बड़ा आश्चर्य हुआ. नगर में पहले से अधिक बाग, तालाब, कुएं तथा बहुत सी धर्मशाला मन्दिर आदि बन गई हैं. राजा ने पूछा यह किसका बाग और धर्मशाला हैं, तब नगर के सब लोग कहने लगे यह सब रानी और बांदी के हैं. तो राजा को आश्चर्य हुआ और गुस्सा भी आया.

जब रानी ने यह खबर सुनी कि राजा आरहे हैं, तो उन्होंने बाँदी से कहा कि: हे दासी! देख राजा हमको कितनी बुरी हालत में छोड़ गए थे. हमारी ऐसी हालत देखकर वह लौट न जायें, इसलिए तू दरवाजे पर खड़ी हो जा. आज्ञानुसार दासी दरवाजे पर खड़ी हो गई. राजा आए तो उन्हें अपने साथ लिवा लाई. तब राजा ने क्रोध करके अपनी रानी से पूछा कि यह धन तुम्हें कैसे प्राप्त हुआ है, तब उन्होंने कहा: हमें यह सब धन बृहस्पतिदेव के इस व्रत के प्रभाव से प्राप्त हुआ है.

राजा ने निश्चय किया कि सात रोज बाद तो सभी बृहस्पतिदेव का पूजन करते हैं परन्तु मैं प्रतिदिन दिन में तीन बार कहानी तथा रोज व्रत किया करूँगा. अब हर समय राजा के दुपट्‌टे में चने की दाल बँधी रहती तथा दिन में तीन बार कहानी कहता.

एक रोज राजा ने विचार किया कि चलो अपनी बहिन के यहाँ हो आवें. इस तरह निश्चय कर राजा घोड़े पर सवार हो अपनी बहिन के यहाँ को चलने लगा. मार्ग में उसने देखा कि कुछ आदमी एक मुर्दे को लिए जा रहे हैं, उन्हें रोककर राजा कहने लगा: अरे भाइयों! मेरी बृहस्पतिदेव की कथा सुन लो.

वे बोले: लो! हमारा तो आदमी मर गया है, इसको अपनी कथा की पड़ी है. परन्तु कुछ आदमी बोले: अच्छा कहो हम तुम्हारी कथा भी सुनेंगे. राजा ने दाल निकाली और जब कथा आधी हुई थी कि मुर्दा हिलने लग गया और जब कथा समाप्त हो गई तो राम-राम करके मनुष्य उठकर खड़ा हो गया.

आगे मार्ग में उसे एक किसान खेत में हल चलाता मिला. राजा ने उसे देख और उससे बोले: अरे भईया! तुम मेरी बृहस्पतिवार की कथा सुन लो. किसान बोला जब तक मैं तेरी कथा सुनूंगा तब तक चार हरैया जोत लूंगा. जा अपनी कथा किसी और को सुनाना. इस तरह राजा आगे चलने लगा. राजा के हटते ही बैल पछाड़ खाकर गिर गए तथा किसान के पेट में बड़ी जोर का दर्द होने लगा.

उस समय उसकी माँ रोटी लेकर आई, उसने जब यह देखा तो अपने पुत्र से सब हाल पूछा और बेटे ने सभी हाल कह दिया तो बुढ़िया दौड़ी-दौड़ी उस घुड़सवार के पास गई और उससे बोली कि मैं तेरी कथा सुनूंगी तू अपनी कथा मेरे खेत पर चलकर ही कहना. राजा ने बुढ़िया के खेत पर जाकर कथा कही, जिसके सुनते ही वह बैल उठ खड़ हुए तथा किसान के पेट का दर्द भी बन्द हो गया.

राजा अपनी बहिन के घर पहुँचा. बहिन ने भाई की खूब मेहमानी की. दूसरे रोज प्रातःकाल राजा जगा तो वह देखने लगा कि सब लोग भोजन कर रहे हैं.

राजा ने अपनी बहिन से कहा: ऐसा कोई मनुष्य है जिसने भोजन नहीं किया हो, मेरी बृहस्पतिवार की कथा सुन ले.

बहिन बोली: हे भैया! यह देश ऐसा ही है कि पहले यहाँ लोग भोजन करते हैं, बाद में अन्य काम करते हैं. अगर कोई पड़ोस में हो तो देख आउं.

वह ऐसा कहकर देखने चली गई परन्तु उसे कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिला, जिसने भोजन न किया हो अतः वह एक कुम्हार के घर गई जिसका लड़का बीमार था. उसे मालूम हुआ कि उनके यहाँ तीन रोज से किसी ने भोजन नहीं किया है। रानी ने अपने भाई की कथा सुनने के लिए कुम्हार से कहा वह तैयार हो गया. राजा ने जाकर बृहस्पतिवार की कथा कही जिसको सुनकर उसका लड़का ठीक होगया, अब तो राजा की प्रशंसा होने लगी.

एक रोज राजा ने अपनी बहिन से कहा कि हे बहिन! हम अपने घर को जायेंगे. तुम भी तैयार हो जाओ. राजा की बहिन ने अपनी सास से कहा. सास ने कहा हाँ चली जा. परन्तु अपने लड़कों को मत ले जाना क्योंकि तेरे भाई के कोई औलाद नहीं है.

बहिन ने अपने भईया से कहा: हे भईया! मैं तो चलूंगी पर कोई बालक नहीं जाएगा.

राजा बोला: जब कोई बालक नहीं चलेगा, तब तुम ही क्या करोगी.

बड़े दुःखी मन से राजा अपने नगर को लौट आया.

राजा ने अपनी रानी से कहा: हम निरवंशी हैं। हमारा मुंह देखने का धर्म नहीं है और कुछ भोजन आदि नहीं किया.

रानी बोली: हे प्रभो! बृहस्पतिदेव ने हमें सब कुछ दिया है, वह हमें औलाद अवश्य देंगे.

उसी रात को बृहस्पतिदेव ने राजा से स्वप्न में कहा: हे राजा उठ सभी सोच त्याग दे, तेरी रानी गर्भ से है. राजा की यह बात सुनकर बड़ी खुशी हुई.

नवें महीने में उसके गर्भ से एक सुन्दर पुत्र पैदा हुआ. तब राजा बोला: हे रानी! स्त्री बिना भोजन के रह सकती है, पर बिना कहे नहीं रह सकती. जब मेरी बहिन आवे तुम उससे कुछ कहना मत। रानी ने सुनकर हाँ कर दिया.

जब राजा की बहिन ने यह शुभ समाचार सुना तो वह बहुत खुश हुई तथा बधाई लेकर अपने भाई के यहाँ आई, तभी रानी ने कहा: घोड़ा चढ़कर तो नहीं आई, गधा चढ़ी आई.

राजा की बहिन बोली: भाभी मैं इस प्रकार न कहती तो तुम्हें औलाद कैसे मिलती.

बृहस्पतिदेव ऐसे ही हैं, जैसी जिसके मन में कामनाएँ हैं, सभी को पूर्ण करते हैं, जो सदभावनापूर्वक बृहस्पतिवार का व्रत करता है एवं कथा पढता है, अथवा सुनता है, दूसरो को सुनाता है, बृहस्पतिदेव उसकी सभी मनोकामना पूर्ण करते हैं. प्रेम से बोलो ब्रहस्पति देव भगवन की जय.

राजा की आज्ञानुसार शहर के सभी लोग भोजन करने गए. लेकिन लकड़हारा कुछ देर से पहुँचा इसलिए राजा उसको अपने साथ घर लिवा ले गए और ले जाकर भोजन करा रहे थे तो रानी की दृष्टि उस खूंटी पर पड़ी जिस पर उसका हार लटका हुआ था. वह वहाँ पर दिखाई नहीं दिया. रानी ने निश्चय किया कि मेरा हार इस मनुष्य ने चुरा लिया है। उसी समय सिपाहियों को बुलाकर उसको कारागार में डलवा दिया.

जब लकड़हारा कारागार में पड़ गया और बहुत दुःखी होकर विचार करने लगा कि न जाने कौन से पूर्व जन्म के कर्म से मुझे यह दुःख प्राप्त हुआ है, और उसी साधु को याद करने लगा जो कि जंगल में मिला था.

उसी समय तत्काल बृहस्पतिदेव साधु के रूप में प्रकट हुए और उसकी दशा को देखकर कहने लगे: अरे मूर्ख! तूने बृहस्पतिदेव की कथा नहीं करी इस कारण तुझे दुःख प्राप्त हुआ है. अब चिन्ता मत कर बृहस्पतिवार के दिन कारागार के दरवाजे पर चार पैसे पड़े मिलेंगे. उनसे तू बृहस्पतिदेव की पूजा करना तेरे सभी कष्ट दूर हो जायेंगे.

बृहस्पति के दिन उसे चार पैसे मिले. लकड़हारे ने कथा कही उसी रात्रि को बृहस्पतिदेव ने उस नगर के राजा को स्वप्न में कहा: हे राजा! तूमने जिस आदमी को कारागार में बन्द कर दिया है वह निर्दोष है. वह राजा है उसे छोड़ देना। रानी का हार उसी खूंटी पर लटका है. अगर तू ऐसा नही करेगा तो मैं तेरे राज्य को नष्ट कर दूंगा.

इस तरह रात्रि के स्वप्न को देखकर राजा प्रातःकाल उठा और खूंटी पर हार देखकर लकड़हारे को बुलाकर क्षमा मांगी तथा लकड़हारे को योग्य सुन्दर वस्त्र-आभूषण देकर विदा कर दिया. बृहस्पतिदेव की आज्ञानुसार लकड़हारा अपने नगर को चल दिया.

राजा जब अपने नगर के निकट पहुँचा तो उसे बड़ा आश्चर्य हुआ. नगर में पहले से अधिक बाग, तालाब, कुएं तथा बहुत सी धर्मशाला मन्दिर आदि बन गई हैं. राजा ने पूछा यह किसका बाग और धर्मशाला हैं, तब नगर के सब लोग कहने लगे यह सब रानी और बांदी के हैं. तो राजा को आश्चर्य हुआ और गुस्सा भी आया.

जब रानी ने यह खबर सुनी कि राजा आरहे हैं, तो उन्होंने बाँदी से कहा कि: हे दासी! देख राजा हमको कितनी बुरी हालत में छोड़ गए थे. हमारी ऐसी हालत देखकर वह लौट न जायें, इसलिए तू दरवाजे पर खड़ी हो जा. आज्ञानुसार दासी दरवाजे पर खड़ी हो गई. राजा आए तो उन्हें अपने साथ लिवा लाई. तब राजा ने क्रोध करके अपनी रानी से पूछा कि यह धन तुम्हें कैसे प्राप्त हुआ है, तब उन्होंने कहा: हमें यह सब धन बृहस्पतिदेव के इस व्रत के प्रभाव से प्राप्त हुआ है.

राजा ने निश्चय किया कि सात रोज बाद तो सभी बृहस्पतिदेव का पूजन करते हैं परन्तु मैं प्रतिदिन दिन में तीन बार कहानी तथा रोज व्रत किया करूँगा. अब हर समय राजा के दुपट्‌टे में चने की दाल बँधी रहती तथा दिन में तीन बार कहानी कहता.

एक रोज राजा ने विचार किया कि चलो अपनी बहिन के यहाँ हो आवें. इस तरह निश्चय कर राजा घोड़े पर सवार हो अपनी बहिन के यहाँ को चलने लगा. मार्ग में उसने देखा कि कुछ आदमी एक मुर्दे को लिए जा रहे हैं, उन्हें रोककर राजा कहने लगा: अरे भाइयों! मेरी बृहस्पतिदेव की कथा सुन लो.

वे बोले: लो! हमारा तो आदमी मर गया है, इसको अपनी कथा की पड़ी है. परन्तु कुछ आदमी बोले: अच्छा कहो हम तुम्हारी कथा भी सुनेंगे. राजा ने दाल निकाली और जब कथा आधी हुई थी कि मुर्दा हिलने लग गया और जब कथा समाप्त हो गई तो राम-राम करके मनुष्य उठकर खड़ा हो गया.

आगे मार्ग में उसे एक किसान खेत में हल चलाता मिला. राजा ने उसे देख और उससे बोले: अरे भईया! तुम मेरी बृहस्पतिवार की कथा सुन लो. किसान बोला जब तक मैं तेरी कथा सुनूंगा तब तक चार हरैया जोत लूंगा. जा अपनी कथा किसी और को सुनाना. इस तरह राजा आगे चलने लगा. राजा के हटते ही बैल पछाड़ खाकर गिर गए तथा किसान के पेट में बड़ी जोर का दर्द होने लगा.

उस समय उसकी माँ रोटी लेकर आई, उसने जब यह देखा तो अपने पुत्र से सब हाल पूछा और बेटे ने सभी हाल कह दिया तो बुढ़िया दौड़ी-दौड़ी उस घुड़सवार के पास गई और उससे बोली कि मैं तेरी कथा सुनूंगी तू अपनी कथा मेरे खेत पर चलकर ही कहना. राजा ने बुढ़िया के खेत पर जाकर कथा कही, जिसके सुनते ही वह बैल उठ खड़ हुए तथा किसान के पेट का दर्द भी बन्द हो गया.

राजा अपनी बहिन के घर पहुँचा. बहिन ने भाई की खूब मेहमानी की. दूसरे रोज प्रातःकाल राजा जगा तो वह देखने लगा कि सब लोग भोजन कर रहे हैं.

राजा ने अपनी बहिन से कहा: ऐसा कोई मनुष्य है जिसने भोजन नहीं किया हो, मेरी बृहस्पतिवार की कथा सुन ले.

बहिन बोली: हे भैया! यह देश ऐसा ही है कि पहले यहाँ लोग भोजन करते हैं, बाद में अन्य काम करते हैं. अगर कोई पड़ोस में हो तो देख आउं.

वह ऐसा कहकर देखने चली गई परन्तु उसे कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिला, जिसने भोजन न किया हो अतः वह एक कुम्हार के घर गई जिसका लड़का बीमार था. उसे मालूम हुआ कि उनके यहाँ तीन रोज से किसी ने भोजन नहीं किया है. रानी ने अपने भाई की कथा सुनने के लिए कुम्हार से कहा वह तैयार हो गया. राजा ने जाकर बृहस्पतिवार की कथा कही जिसको सुनकर उसका लड़का ठीक होगया, अब तो राजा की प्रशंसा होने लगी.

एक रोज राजा ने अपनी बहिन से कहा कि हे बहिन! हम अपने घर को जायेंगे. तुम भी तैयार हो जाओ. राजा की बहिन ने अपनी सास से कहा. सास ने कहा हाँ चली जा. परन्तु अपने लड़कों को मत ले जाना क्योंकि तेरे भाई के कोई औलाद नहीं है.

बहिन ने अपने भईया से कहा: हे भईया! मैं तो चलूंगी पर कोई बालक नहीं जाएगा.

राजा बोला: जब कोई बालक नहीं चलेगा, तब तुम ही क्या करोगी.

बड़े दुःखी मन से राजा अपने नगर को लौट आया.

राजा ने अपनी रानी से कहा: हम निरवंशी हैं. हमारा मुंह देखने का धर्म नहीं है और कुछ भोजन आदि नहीं किया.

रानी बोली: हे प्रभो! बृहस्पतिदेव ने हमें सब कुछ दिया है, वह हमें औलाद अवश्य देंगे.

उसी रात को बृहस्पतिदेव ने राजा से स्वप्न में कहा: हे राजा उठ। सभी सोच त्याग दे, तेरी रानी गर्भ से है. राजा की यह बात सुनकर बड़ी खुशी हुई.

नवें महीने में उसके गर्भ से एक सुन्दर पुत्र पैदा हुआ. तब राजा बोला: हे रानी! स्त्री बिना भोजन के रह सकती है, पर बिना कहे नहीं रह सकती. जब मेरी बहिन आवे तुम उससे कुछ कहना मत। रानी ने सुनकर हाँ कर दिया.

जब राजा की बहिन ने यह शुभ समाचार सुना तो वह बहुत खुश हुई तथा बधाई लेकर अपने भाई के यहाँ आई, तभी रानी ने कहा: घोड़ा चढ़कर तो नहीं आई, गधा चढ़ी आई.

राजा की बहिन बोली: भाभी मैं इस प्रकार न कहती तो तुम्हें औलाद कैसे मिलती.

बृहस्पतिदेव ऐसे ही हैं, जैसी जिसके मन में कामनाएँ हैं, सभी को पूर्ण करते हैं, जो सदभावनापूर्वक बृहस्पतिवार का व्रत करता है एवं कथा पढता है, अथवा सुनता है, दूसरो को सुनाता है, बृहस्पतिदेव उसकी सभी मनोकामना पूर्ण करते हैं.

ब्रहस्पतिवार व्रत में ध्यान देने योग्य बातें

केले का सेवन नहीं करना चाहिए

अगर आप विष्णु जी की पूजा अर्चना करते हैं तो उस दिन केले का सेवन बिल्कुल नहीं करना चाहिए. यह भी कहा जाता है कि केले के पेड़ में भगवान विष्णु जी का निवास होता है.

पीली वस्तुओं को दान करना चाहिए

ब्रहस्पतिवार के दिन विष्णु जी की पूजा अर्चना करने के बाद गुड़, पीला कपड़ा, चने की दाल और केला भगवान को चढ़ाकर गरीब को दान करना चाहिए. इससे विष्णु जी की कृपा दृष्टि सदैव बनी रहती है.

चावल या खिचड़ी को न खाएँ

ब्रहस्पतिवार के दिन विष्णु जी की पूजा अर्चना करने के बाद पीला भोजन ही ग्रहण करें. इससे विष्णु जी खुश रहते है. इस दिन भूलकर भी काली दाल की खिचड़ी और चावल को खाना वर्जित है. यह भी कहा जाता है कि इस दिन चावल का सेवन करने से धन की हानि होती है. विष्णु जी को चावल की जगह तिल चढ़ाना चाहिए .

गाय को रोटी जरूर खिलाना चाहिए

 हिंदू धर्म में ऐसा माना जाता है कि गायों में कई करोड़ देवताओं का निवास होता है. शास्त्रों के अनुसार ब्रहस्पतिवार के दिन गाय को रोटी और गुड़ खिलाने से सभी दुःख दूर हो जाते हैं.

बाल और नाखून को नहीं काटना चाहिए

हिंदू धर्म के अनुसार ब्रहस्पतिवार के दिन नाखून और बाल काटने से गुरु कमजोर होता है. इससे धन में भी हानि होती है. शास्त्रों के अनुसार महिलाओं को इस दिन बाल और कपड़े धोने से मान की हानि होती हैं.

गुरुवार व्रत विधि- Thursday Vrat Vidhi

  1. इस व्रत का उद्यापन करने के लिए सुबह समय से उठकर तैयार हो जाएँ, और पूजा घर में गंगाजल को छिड़क कर अच्छे से साफ़ कर लें.
  2. और ध्यान रखें की पीले वस्त्र ही पहनें.
  3. पूजा घर को साफ करने के बाद या अलग से आसान लगाकर उस पर भगवान् विष्णु की प्रतिमा को स्थापित करें.
  4. उसके बाद मंदिर या अपने घर के आस पास स्थित केले के पेड़ की पूजा अर्चना करें, जल चढ़ाकर दीपक जलाएं.
  5. फिर षोडशोपचार पूजन विधि से विष्णु जी का पूजन करे .
  6. अब घर आकर या वही बैठकर कथा करें.
  7. उसके बाद प्रसाद लोगो में बाटें.
  8. उसके बाद श्री हरी के मंत्रो का उच्चारण करके यदि कोई गलती हुई तो उसके लिए माफ़ी मांगे.

Guruvar Vrat Benefits

  • वृहस्पतिवार का व्रत करने से शादी में आने वाली रुकावटें अपने आप समाप्त हो जाती हैं
  • वृहस्पतिवार का व्रत करने से सभी परेशानियाँ और कष्ट दूर होते हैं
  • इस दिन व्रत करने से मनुष्य की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं
  • यह भी कहा गया है कि घर में धन – धान्य और सुख – शान्ति की वृद्धि होती है
  • ऐसा मानना है कि इस दिन व्रत करने से विष्णु जी और माँ लक्ष्मी जी प्रसन्न होती हैं
  • ब्रहस्पतिवार का व्रत करने से जातक के घर में अन्न की कमी कभी नहीं रहती है
  • यह भी कहा गया है कि इस दिन व्रत रखने से गुरु ग्रह की दशा सही होने में मदद मिलती है
  • लोगो का मानना है कि इस दिन व्रत रखने से विद्या और बुद्धि की प्राप्ति होती है

Thursday Fast Food

  • लोगों का मानना है कि कुछ खाद्य पदार्थ शरीर में सात्विकता बढ़ाने के लिए सहायक सिद्ध होते हैं. इसलिए इन्हें प्रयोग करना ही सही जाना जाता है.
  • यह मानना है कि दूध से बनी कोई भी वस्तु भी प्रयोग में ली जा सकती है.
  • यह भी कहा जाता है कि शारीरिक शुद्धि के लिए तुलसी जल, अदरक का पानी या फिर अंगूर का भी सेवन कर सकते हैं। तथा मानसिक शुद्धि के लिए जप, ध्यान, सत्संग, दान और धार्मिक सभाओं में भाग ले सकते हैं.
  • मान्यतानुसार इस दिन एक बार बिना नमक का पीला भोजन करना चाहिए. भोजन में चने की दाल का भी प्रयोग अवश्य किया जाना चाहिए .
  • लोगों का मानना है कि गुरूवार के दिन विष्णु जी को प्रसन्न करने के लिए जो लोग व्रत करते हैं, वे लोग उस दिन केवल शाम के समय ही किसी वस्तु का सेवन कर सकते हैं.
  • ऐसी मान्यता है कि दिन के समय आप चाय, दूध, शरबत आदि पी सकते हैं और आप दिन में फलों का सेवन भी कर सकते हैं.
  • यह भी कहा जाता है कि इस दिन व्रत के दौरान व्रती को किसी भी प्रकार का नमक ग्रहण नहीं करना चाहिए.