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दुर्गाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् (श्री दुर्गासप्तशती) 108 Names

STOTRA

दुर्गाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् माता की आराधना के लिए बनी श्री दुर्गासप्तशती से लिया गया है इसमें माता भगवती के 108 नाम हैं | कहा जाता है की इस दुर्लभ मंत्र से माँ की असीम कृपा मिलती है| इसका नियमित जाप करने वाले व्यक्ति का कोई भी मनोरथ अधूरा नहीं रहता|

वैसे देवी माता को प्रसन्ना करने के लिए अनेकों देवी स्तोत्र बने गए हैं जो माता को अति प्रिय हैं जैसे श्री अर्गला स्तोत्र एवं सिद्ध कुंजिका स्तोत्र इत्यादि लेकिन आज हम बात करेंगे एक ऐसे Devi Durga Stotram की जिसमें माता के 108 नाम हैं वह है Shri Durga Ashtottara Shatanama Stotram.

Devi Durga Stotram का पाठ समय भी कम लेता है और चमत्कारी फल भी देता है इसलिए इसका महत्व बहुत अधिक माना गया है।

माता दुर्गा की पूजा के बाद एक स्तुति का जाप पारंपरिक रूप से किया जाता है जिसे दुर्गा स्तोत्र कहते हैं Durga stotra lyrics आपको इस लेख में मिल जाएंगे। | See below for 108 names of goddess Durga-

MA DURGA BLESSINGS

Durga stotram benefits

  • दुर्गाजी के इस अष्टोत्तरशतनाम का जो भी पाठ करता है, उसके लिए कुछ भी ऐसा नहीं है जो तीनों लोकों में असाध्य हो
  • 108 names of goddess Durga का जप करने वाला धन, धान्य, पुत्र, स्त्री, घोड़ा, हाथी, धर्म आदि चार पुरुषार्थ तथा अन्त में सनातन मुक्ति भी प्राप्त करता है |
  • उन्नीसवे श्लोक में शिव जी स्वयं कहते हैं की इस स्तोत्र का जाप करने वाला राज्यलक्ष्मी को प्राप्त करता है
  • बीसवें श्लोक में महाकाल शिव जी कहते हैं की गोरोचन, लाक्षा, कुङ्कुम, सिन्दूर, कपूर, घी (अथवा दूध), चीनी और मधु – इन वस्तुओं को एकत्र करके इनसे विधिपूर्वक यन्त्र लिखकर जो विधिज्ञ पुरुष सदा उस यन्त्र को धारण करता है, मोक्ष को प्राप्त हो जाता है
  • भौमवती अमावास्या की आधी रात में, जब चन्द्रमा शतभिषा नक्षत्र पर हों, उस समय इस स्तोत्र को लिखकर जो इसका पाठ करता है, वह सम्पत्तिशाली होता है|
  • इस स्तुति के दैनिक जाप से अशांत मन को शांति मिलती है और निराशा दूर हो जाती है।
  • इससे जातक के मन का भय दूर होता और जातक पराक्रमी हो जाता है।
  • इस स्तुति का जाप करने से देवी माँ अपने भक्त की रक्षा हर प्रकार की मुसीबतों और कठिनाइयों से करती हैं।
MA DURGA TRINETRA HELLOZINDGI

Durga Ashtottara Shatanama Stotram Lyrics

॥ श्री दुर्गाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् ॥ (विश्वसारतन्त्र)

॥ ईश्वर उवाच ॥

शतनाम प्रवक्ष्यामि शृणुष्व कमलानने ।

यस्य प्रसादमात्रेण दुर्गा प्रीता भवेत् सती ॥ 1 

ॐ सती साध्वी भवप्रीता भवानी भवमोचनी ।

आर्या दुर्गा जया चाद्या त्रिनेत्रा शूलधारिणी ॥ 2

पिनाकधारिणी चित्रा चण्डघण्टा महातपाः ।

मनो बुद्धिरहंकारा चित्तरूपा चिता चितिः ॥ 3

सर्वमन्त्रमयी सत्ता सत्यानन्द स्वरूपिणी ।

अनन्ता भाविनी भाव्या भव्याभव्या सदागतिः ॥ 4

शाम्भवी देवमाता च चिन्ता रत्नप्रिया सदा ।

सर्वविद्या दक्षकन्या दक्षयज्ञविनाशिनी ॥ 5

अपर्णानेकवर्णा च पाटला पाटलावती ।

पट्टाम्बरपरिधाना कलमञ्जरीरञ्जिनी ॥ 6

अमेयविक्रमा क्रूरा सुन्दरी सुरसुन्दरी ।

वनदुर्गा च मातङ्गी मतङ्गमुनिपूजिता ॥ 7

ब्राह्मी माहेश्वरी चैन्द्री कौमारी वैष्णवी तथा ।

चामुण्डा चैव वाराही लक्ष्मीश्च पुरुषाकृतिः ॥ 8

विमलोत्कर्षिणी ज्ञाना क्रिया नित्या च बुद्धिदा ।

बहुला बहुलप्रेमा सर्ववाहन वाहना ॥ 9

निशुम्भशुम्भहननी महिषासुरमर्दिनी ।

मधुकैटभहन्त्री च चण्डमुण्डविनाशिनी ॥ 10

सर्वासुरविनाशा च सर्वदानवघातिनी ।

सर्वशास्त्रमयी सत्या सर्वास्त्रधारिणी तथा ॥ 11

अनेकशस्त्रहस्ता च अनेकास्त्रस्य धारिणी ।

कुमारी चैककन्या च कैशोरी युवती यतिः ॥ 12

अप्रौढ़ा चैव प्रौढ़ा च वृद्धमाता बलप्रदा ।

महोदरी मुक्तकेशी घोररूपा महाबला ॥ 13

अग्निज्वाला रौद्रमुखी कालरात्रिस्तपस्विनी ।

नारायणी भद्रकाली विष्णुमाया जलोदरी ॥ 14

शिवदूती कराली च अनन्ता परमेश्वरी ।

कात्यायनी च सावित्री प्रत्यक्षा ब्रह्मवादिनी ॥ 15

य इदं प्रपठेन्नित्यं दुर्गानामशताष्टकम् ।

नासाध्यं विद्यते देवि त्रिषु लोकेषु पार्वति ॥ 16

धनं धान्यं सुतं जायां हयं हस्तिनमेव च ।

चतुर्वर्गं तथा चान्ते लभेन्मुक्तिं च शाश्वतीम् ॥ 17

कुमारीं पूजयित्वा तु ध्यात्वा देवीं सुरेश्वरीम् ।

पूजयेत् परया भक्त्या पठेन्नामशताष्टकम् ॥ 18

तस्य सिद्धिर्भवेद् देवि सर्वैः सुरवरैरपि ।

राजानो दासतां यान्ति राज्यश्रियमवाप्नुयात् ॥ 19

गोरोचनालक्तककुङ्कुमेव सिन्धूरकर्पूरमधुत्रयेण ।

विलिख्य यन्त्रं विधिना विधिज्ञो भवेत् सदा धारयते पुरारिः ॥ 20

भौमावास्यानिशामग्रे चन्द्रे शतभिषां गते ।

विलिख्य प्रपठेत् स्तोत्रं स भवेत् संपदां पदम् ॥ 21 

॥ इति श्री विश्वसारतन्त्रे दुर्गाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रं समाप्तम् ॥

Durga Saptashati Stotram- In the following lines we are providing Durga Ashtottara Shatanama Stotram Hindi Lyrics-

दुर्गाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् का हिंदी अर्थ
॥ शंकरजी पार्वतीजी से कहते हैं ॥

कमलानने! अब मैं अष्टोत्तरशत (108) नामों का वर्णन करता हूं, सुनो; जिसके प्रसाद (पाठ या श्रवण) मात्र से परम साध्वी भगवती दुर्गा प्रसन्न हो जाती हैं… ॥ 1 ॥

सती (दक्ष की बेटी), साध्वी (आशावादी), भवप्रीता (भगवान् शिव पर प्रीति रखने वाली), भवानी (ब्रह्मांड की निवास), भवमोचनी (संसारबंधनों से मुक्त करने वाली), आर्या, दुर्गा, जया, आद्य (शुरुआत की वास्तविकता), त्रिनेत्र (तीन आंखों वाली), शूलधारिणी, पिनाकधारिणी (शिव का त्रिशूल धारण करने वाली), चित्रा (सुरम्य), चण्डघण्टा (प्रचण्ड स्वर से घण्टानाद करने वाली), महातपा: (भारी तपस्या करने वाली), मन: (मनन-शक्ति), बुद्धि: (बोधशक्ति), अहंकारी (अहंताका आश्रय), चित्तरूपा (वह जो सोच की अवस्था में है), चिता, चिति: (चेतना), सर्वमन्त्रमयी, सत्ता (सत्-स्वरूपा, जो सब से ऊपर है), सत्यानन्दस्वरूपिणी (अनन्त आनंद का रूप), अनन्ता (जिनके स्वरूप का कहीं अन्त नहीं), भाविनी (सबको उत्पन्न करने वाली, ख़ूबसूरत औरत), भाव्या (भावना एवं ध्यान करने योग्य), भव्या (कल्याणरूपा, भव्यता के साथ), अभव्या (जिससे बढकर भव्य कुछ नहीं), सदागति (हमेशा गति में, मोक्ष दान), शाम्भवी (शिवप्रिया, शंभू की पत्नी), देवमाता, चिन्ता, रत्‍‌नप्रिया (गहने से प्यार), सर्वविद्या (ज्ञान का निवास), दक्षकन्या (दक्ष की बेटी), दक्षयज्ञविनाशिनी, अपर्णा (तपस्या के समय पत्ते को भी न खाने वाली), अनेकवर्णा (अनेक रंगों वाली), पाटला (लाल रंग वाली), पाटलावती (गुलाब के फूल या लाल परिधान या फूल धारण करने वाली), पट्टाम्बरपरिधाना (रेशमी वस्त्र पहनने वाली), कलमञ्जीररञ्जिनी (मधुर ध्वनि करने वाले मञ्जीर / पायल को धारण करके प्रसन्न रहने वाली), अमेयविक्रमा (असीम पराक्रमवाली), क्रूरा (दैत्यों के प्रति कठोर), सुन्दरी, सुरसुन्दरी, वनदुर्गा, मातङ्गी, मतङ्गमुनिपूजिता, ब्राह्मी, माहेश्वरी, इंद्री, कौमारी, वैष्णवी, चामुण्डा, वाराही, लक्ष्मी:, पुरुषाकृति: (वह जो पुरुष का रूप ले ले), विमला (आनन्द प्रदान करने वाली), उत्कर्षिणी, ज्ञाना, क्रिया, नित्या, बुद्धिदा, बहुला, बहुलप्रेमा, सर्ववाहनवाहना, निशुम्भशुम्भहननी, महिषासुरमर्दिनी, मधुकैटभहंत्री, चण्डमुण्डविनाशिनी, सर्वासुरविनाशा, सर्वदानवघातिनी, सर्वशास्त्रमयी, सत्या, सर्वास्त्रधारिणी, अनेकशस्त्रहस्ता, अनेकास्त्रधारिणी, कुमारी, एककन्या, कैशोरी, युवती, यति, अप्रौढ़ा (जो कभी पुराना न हो), प्रौढ़ा (जो पुराना है), वृद्धमाता, बलप्रदा, महोदरी, मुक्तकेशी, घोररूपा, महाबला, अग्निज्वाला, रौद्रमुखी, कालरात्रि:, तपस्विनी, नारायणी, भद्रकाली, विष्णुमाया, जलोदरी, शिवदूती, करली, अनन्ता (विनाशरहिता), परमेश्वरी, कात्यायनी, सावित्री, प्रत्यक्षा, ब्रह्मवादिनी ॥ 2-15 ॥

कुमारी का पूजन और देवी सुरेश्वरी का ध्यान करके पराभक्ति के साथ उनका पूजन करें, फिर अष्टोत्तरशत नाम का पाठ आरम्भ करें… ॥ 18 ॥

देवि! जो ऐसा करता है, उसे सब श्रेष्ठ देवताओं से भी सिद्धि प्राप्त होती है… राजा उसके दास हो जाते हैं… वह राज्यलक्ष्मी को प्राप्त कर लेता है… ॥ 19 ॥

गोरोचन, लाक्षा, कुङ्कुम, सिन्दूर, कपूर, घी (अथवा दूध), चीनी और मधु – इन वस्तुओं को एकत्र करके इनसे विधिपूर्वक यन्त्र लिखकर जो विधिज्ञ पुरुष सदा उस यन्त्र को धारण करता है, वह शिव के तुल्य (मोक्षरूप) हो जाता है… ॥ 20 ॥

भौमवती अमावास्या की आधी रात में, जब चन्द्रमा शतभिषा नक्षत्र पर हों, उस समय इस स्तोत्र को लिखकर जो इसका पाठ करता है, वह सम्पत्तिशाली होता है… ॥ 21 ॥

Jain Bhaktamar Stotra-Sanskrit |Mahima| Lyrics| Meaning

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