Dhruv Tara Ki Kahani In Hindi pahchan kaise karein English

Dhruv Tara Ki Kahani In Hindi | pahchan kaise karein | English

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ध्रुव तारा इन हिंदी, माता –पिता और प्रमुख घटनाएं

आज हम आपको बतायेंगे कि ध्रुव कौन थे और हिन्दू पौराणिक ग्रंथों में उनका नाम इतने आदर के साथ क्यों लिया जाता है और किस कारण से इनका उल्लेख है .

ध्रुव भगवान् विष्णु के परम भक्त थे,ध्रुव महाराज उत्तानपाद की पत्नी सुनीति के पुत्र थे जो की पिता से प्रेम करते थे और अपने पिता से प्रेम चाहते थे. पिता भी ध्रुव को बहुत प्रेम करते थे. ध्रुव के प्रति पिता का प्रेम देख कर दूसरी माता को अपमान महसूस हुआ. ध्रुव ने अपने अपमान के बारे में माँ से पूछा तो ध्रुव की माँ ने ध्रुव को भगवान को प्रसन्न करने के लिए तपस्या करने को कहा ध्रुव तपस्या करने वन चला गया .

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ध्रुव की कहानी का वर्णन विष्णु पुराण और भागवत पुराण में हैं इसलिए इसे कहानी को बेहद आस्था के साथ पढ़ना चाहिए .

Dhruva  Tara in English

Dhruva Maharaj was the son of Uttanpad’s wife Suniti, who loved his father and wanted love. Just a small incident and mother’s explanation. The meeting of Narada on the way and then the penance finally the place in the sky.

There is a very wonderful and inspirational story of Dhruva, it is described in Vishnu Puran and Bhagavata Purana.

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ध्रुव तारे की पहचान

ध्रुव तारा ओरियन में दूसरा तारा है यह तारा उत्तर दिशा में स्थित और अडिग तारा है. यह आकाश में उत्तर दिशा में सबसे चमकीला तारा है . इसे आप आसानी से पहचान सकते हैं क्योंकि यह सबसे तेज चमकता है . इसके माध्यम से कोई भी दिशा का ज्ञान बेहद आसानी से कर सकता है .

ध्रुव तारे की कहानी हिंदी में

ध्रुव को पौराणिक ग्रंथों में यह स्थान और यह महत्व कैसे हासिल हुआ. इसके पीछे क्या कारण थे ? क्योंकि हिन्दू पौराणिक ग्रंथों में ध्रुव का नाम बहुत आदरपूर्वक लिया जाता है क्योंकि जिस आत्मसम्मान के लिए ध्रुव ने माँ को छोड़ दिया यह अपने आप में मिसाल है ऐसे चरित्र मनुष्य की इच्छाशक्ति और संकल्प की शक्ति को लोगों के सामने रखते हैं जिससे उनमें  संकल्प और इच्छाशक्ति जाग सके .

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ध्रुव की कथा विष्णु पुराण और भगवत पुराण में वर्णित है. प्राचीन समय में उत्तानपाद नाम के एक राजा थे. उनकी पत्नी का नाम सुनीति था. दोनों एक दुसरे को बेहद प्यार करते थे लेकिन महाराज को कोई संतान नहीं थी. बस यही एक दुःख दोनों को था. महाराज संतान चाहते थे. महाराज उत्तानपाद ने जब अपनी इच्छा सुनीति को बताई तो सुनीति ने महराज को संतान के लिए दूसरा विवाह करने की अनुमति दी . राजा उत्तानपाद ने सुरुचि नाम की सुन्दर युवती से विवाह किया . राजा उतान्पाद सुनीति को भी उतना ही प्रेम करते थे जितना प्रेम वह सुरुचि से करते थे . महाराज उत्तानपाद को बुढ़ापे में दोनों रानियों से संतान हुई . सुनीति के पहले संतान हुई तो उसका नाम ध्रुव रखा गया .

सुरुचि के संतान हुई तो उनका नाम उत्तम रखा गया. महाराज उत्तानपद दोनों पुत्रों को खूब प्रेम करते थे. महारानी सुरुचि के रंग रूप और पुत्र के कारण महराज का सुरुचि से प्रेम बढ़ गया. सुनीति लगातार उपेक्षा का शिकार हो रही थीं. महारानी सुरुचि चाहती थी कि राजा का तनिक प्रेम भी रानी सुनीति और पुत्र ध्रुव का न मिले तो इसके लिए रानी सुरुचि अपमानित  करने के अवसर ढूँढती रहती थी, अवसर मिलने पर खूब अपमानित करती थी.

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एक बार की बात थी महराज अपने सिंहासन पर विराजमान थे और ध्रुव अपनी माँ के मना करने के बाबजूद महराज की गोद में जाकर बैठ गए. महाराज उत्तानपाद ध्रुव को प्रेम करने लगे. महाराज द्वारा ध्रुव को प्रेम करते देख सुरुचि से देखा न गया और उसने महाराज उत्तानपाद की गोद से ध्रुव को उत्तर दिया.महाराज को बहुत बुरा महसूस हुआ. लेकिन वह रानी से कुछ कह न सके . लेकिन ध्रुव इस अपमान का कारण अपनी माँ से पूछा ? तो माता सुनीति ने कहा पुत्र तुम्हे ईश्वर की गोद में बैठने के लिए प्रयास करना चाहिए, न कि महाराज उत्तानपाद की क्योंकि महाराज उत्तानपाद की गोद तो तुम्हारे छोटे भाई उत्तम की है . आपको भगवान् की गोद के लिए तपस्या करनी चाहिए इतनी बात सुन बालक ध्रुव ने वन को प्रस्थान किया. रास्ते में ध्रुव ने ऋषि के रूप में नारद को देखा. नारद से ध्रुव ने भगवान् की प्राप्ति के साधन पूछे ? तो ऋषि नारद ने ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमा बताया. ध्रुव ने नारद के बताये नियमों से तपस्या की और जल्दी ही भगवान् ध्रुव की तपस्या से प्रसन्न हुए, और  ध्रुव को सांसारिक सुखों का वरदान दिया और अपने धाम में स्थान देने का वचन दे अपने धाम को प्रस्थान किया. महाराज ध्रुव सांसारिक सुख भोग कर भगवान्  के परम धाम पहुंचे, तो भगवान् ने उन्हें अपने वचन के अनुसार स्थान दिया और ध्रुव ने उस स्थान को ग्रहण किया .

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ध्रुव महराज उत्तानपाद के पुत्र थे ध्रुव की सौतेली माँ द्वारा अपमान और इर्ष्या के बाद की तपस्या और त्याग की कथा है ध्रुव के प्रस्थान के बाद भगवान् ने उन्हें सप्त ऋषिमंडल में दूसरा स्थान दिया . यह उत्तर दिशा में सबसे चमकीला तारा है और यह स्थिर रहता है .