kabir das ji nindak neare rakhiye

निंदक नियरे राखिए | Meaning in Hindi | Full Doha | Nibandh

Suvichar

आज कल के माहौल में क्या आप अपने निंदक के साथ रहना या अपनी बुराई करने वाले व्यक्ति को अपने साथ रखना पसंद करेंगे?

आइये जानें ”निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय”, दोहे में कवि महोदय क्या कहना चाहता है | व्यक्ति निंदक के साथ रहने पर भी लाभ की स्थिति में कैसे रहता है?  क्योंकि निंदक आप की गलतियों को उजागर करेगा|

आपको गलतियों में सुधार करने का मौका देता है और आप वही गलतियां बार बार करने से बच सकते हैं ।

Nindak Niyare Rakhiye/ निंदक नियरे राखिए – Full Doha

”निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय,
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।”

यह कबीर दास जी का पूरा दोहा है। इस दोहे में कबीर जी ने कहा है कि व्यक्ति को हमेशा प्रशंसा करने वालों से सावधान रहना चाहिए और अपनी निंदा करने वालों को अपने पास रखना चाहिए क्योकि निंदा सुनकर ही हम अंदर से स्वयं को स्वच्छ करने का विचार कर सकते है। जो बिना साबुन ,बिना पानी के ही स्वच्छ हो जाता है। 

Nindak Niyare Rakhiye In Hindi Meaning

निंदक-जो व्यक्ति हमेशा दूसरो की बुराई करता हो।
नियरे राखिए- पास ही रखना चाहिए।
कुटी छवाय- कुटिया बनबानी चाहिए।
बिन पानी- बिना पानी के।
साबुन बिना- साबुन के बिना।
निर्मल करे सुभाय- मन को साफ और स्वच्छ करता है।

Ninda Meaning निंदा का अर्थ क्या होता है?

निंदा एक ऐसी चीज है जिसे करने और सुनने में अलग ही आनंद आता है। निंदा के कई अर्थ निकलते हैं जैसे एक व्यक्ति के पास दूसरे व्यक्ति की बुराई करना , किसी व्यक्ति को बुरा साबित करने के लिए उसके अंदर तरह तरह की गलतियां निकालना | किसी व्यक्ति की ख्याति को खराब करना तथा उस व्यक्ति को सबके सामने बदनाम करना  | तथा जहाँ भी जाना वहाँ  पर उस व्यक्ति की शिकायती बातें करना आदि ये सब  निंदा कहलाती है।

Kabirdas Ji Ka Jivan- कबीर दास जी का जीवन

Kabirdas Ji Ka Jivan- कबीर दास जी का जीवन

कबीर दास जी का जन्म 1440 में हुआ था। इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि उनके असली माता पिता कौन थे |

लेकिन इतिहासकारों का मानना है कि उनका लालन पालन एक गरीब मुस्लिम परिवार में हुआ था।

उनको नीरू और नीमा नाम के जुलाहे ने वाराणसी के एक छोटे नगर महरतारा में एक तालाब के किनारे से पाया था।

इनके गुरु रामानंद थे | इन्होने धार्मिक शिक्षा रामानंद  जी से ही   ग्रहण की थी। शुरुआत में गुरु रामानंद ने इन्हे शिष्य मानने से मना कर दिया था पर बहुत प्रयास के बाद एक घटना से प्रभावित होकर उन्होनें इन्हे अपना शिष्य बनाया। 

कबीर दास पहले भारतीय संत थे जिसे हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों के लोगों ने माना। इनके अनुसार जीवन का दो धार्मिक सिद्धान्तों (जीवात्मा और परमात्मा ) से रिश्ता होता है।

मोक्ष के वारे में उनका विचार था कि ये दो दैवीय सिद्धांतों को एक करने की प्रक्रिया है।

कबीर की महान  रचना बीजक उनकी कविताओं का संग्रह है। उनकी भाषा सरल व सामान्य थी। वे दोनों धर्मो की बुराईयों के घोर विरोधी थे।

वे भक्ति व सूफी विचार धारा के संत थे। उनकी कविताओं को साखी, श्लोक (शब्द) और दोहे (रमैनी) कहा जाता है।

साखी का अर्थ है कि परम सत्य को याद करते रहना। कबीर दास ने अपने मरने की जगह खुद चुनी थी।  इनकी मृत्यु 1598 में मगहर में हुई थी। यहाँ एक मिथक था कि काशी में मरने वाला व्यक्ति स्वर्ग जाता है और मगहर में मरने वाला व्यक्ति नरक में जाता है। कबीर दास ने पूरा जीवन काशी में बिता कर मगहर में प्राण त्यागे थे।    

निन्दक नियरे राखिये पर – संक्षिप्त निबंध-

ZAMANE KI UNSUNI KARNA

हमारे देश में निंदा का इतिहास बहुत पुराना है। निंदा के कई प्रकार है साधारण निंदा ,कड़ी निंदा , बेहद कड़ी निंदा वैसे तो एक वार की गई निंदा बहुत लम्बे समय तक चलती है। निंदा में स्वाद भी होता है। तभी तो कुछ व्यक्ति स्वदानुसार निंदा करते है। हमारे सूफी संत तथा ऋषि मुनियों ने भीकहा है कि ” ”निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय,

बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।” दोहे में इसका गुणगान किया है। यह निंदा रस कहलाता है। जब निंदा रस हास्य रस के मिल जाता है तो मन को अधिक सुख देता है तथा तन को स्फूर्ति प्रदान करता है।

वैसे तो निंदा करना व सुनना सभी को अच्छा लगता है। परन्तु महिलाओं में इस का प्रयोग अधिक मात्रा में किया जाता है जब दो या दो से अधिक महिलायें आपस में मिलती है तो  निंदा रस का वहतर प्रयोग करती है।

महिलायें निंदा रस में माहिर होती है। जब निंदा रस शुरू होता है तो समय भी कम पड़ जाता है। निंदा हास्य का विषय ही नहीं अपितु व्यक्ति के गुणों में सुधर करता है।

Kabirdas Ke pramukh Dohe

मन के हारे हार है,मन के जीते जीत।
कहे कबीर गुरु पाइये ,मन ही के प्रतीत।

कस्तूरी कुण्डल बसै मृग ढूढ़े वन माहि।
ऐसे घट घट राम है दुनिया देखे नाहिं।।

जात न पूछो साधु की पूछ लीजिए ज्ञान।
मोल करो तलवार का पड़ा रहन दो म्यान।।

कबीर खड़ा बाजार में सब की माँगे खैर।
ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर।।

बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर।
पंछी को छाया नहीं फल लागे अति दूर।।

राम नाम को लूट है लूट सके तो लूट।
अंत काल पछतायेगा जब प्राण जाएगा छूट।

बुरा जो देखन मै चला बुरा न मिलिया कोय।
जो दिल खोजा आपना मुझसे बुरा न कोय।।

काम क्रोध मद लोभ की जब लग घट में खान।
कबीर मुख पंडिता दोनों एक समान।।

माला फेरत जुग गया मिटा न मन का फेर।
करका मनका डार दे मन का मनका फेर।

ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोए।
औरन को शीतल करे आपहु शीतल होय।।

बहता पानी निर्मला बँधा गंदा होय। 
साधु जन रमता भला दाग़  ना लागै कोय।।

कल करे सो आज कर आज करे सो अब।
पल में प्रलय होएगी बहुरि करेगा कब।

गुरु गोविन्द दोउ खड़े काके लागे पाय।
बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताय।।

दुःख में सुमिरन सब करें सुख में करै न कोय।
जो सुख में सुमिरन करें तो दुःख काहे को होय।।