विद्यार्थी और अनुशासन पर निबंध हिंदी में Vidyarthi Jeevan And Anushasan Short Essay

 विद्यार्थी और अनुशासन पर निबंध हिंदी में | Vidyarthi Jeevan And Anushasan Short Essay

NIBANDH IN HINDI

मित्रों विद्यार्थी और अनुशासन  पर हिंदी में निबंध प्रस्तुत है. यदि वर्तमान परिवेश में देखा जाये तो विद्यार्थी और अनुशासन Essay in Hindi , निबंध लेखन का एक महत्वपूर्ण विषय है. आप विद्यार्थी और अनुशासन पर हिंदी निबंध पढ़ें एवं अपने ज्ञान का वर्धन करें. हमें उम्मीद है कि विद्यार्थी और अनुशासन निबंध आपको अवश्य पसंद आएगा.   

भूमिका

दरअसल आपको यह बता दें कि नियमवद्ध एवं नियन्त्रण में रहकर कार्य करना अनुशासन कहलाता है। अनुशासन मानवजीवन का महत्त्वपूर्ण अंग है। सूर्य का अस्त होना, ऋतुओं का परिवर्तन इस तथ्य के प्रमाण हैं। कोई भी जब अनुशासनहीन जाता है तो अव्यवस्था पूरी तरह से फैलती है। प्रत्येक मनुष्य अनुशासन में रहकर ही समाज के लिए बहुत ही उपयोगी हो सकता है। स्तिथियों में अनुशासन का होना बहुत अनिवार्य है क्योंकि उन्होंने आगे चलकर देश की बागडोर सम्भालनी है। शासन विद्यार्थी जीवन की सफलता की एक बहुत बड़ी कुंजी है।

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अनुशासन का महत्त्व

बता दें कि बिना अनुशासन के विद्यार्थी जीवन का निर्माण बिल्कुल भी नहीं कर सकता। जो विद्यार्थी अनुशासन में नहीं रहता उसे असफलता का मुँह देखना अवश्य पड़ता है। जिस सेना में अव्यवस्था हो वह सेना भी देश की रक्षा करने में पूरी तरह से असफल हो जाती है। जिस कारखाने में मजदूर अनुशासनहीन हो जाते हैं, वह शीघ्र ही अवनति के गड्डे में गिर जाता है।

कहा जाता है कि शिक्षा प्रांगण में राजनीति भी इसका एक कारण बना हुआ है। विद्यार्थी आज-कल नकारात्मक राजनीति भी करने पर उतारू है, झूठ, लड़ाई-झगड़े से चुनाव जीतना चाहते हैं। विद्यार्थी अपना यूनियन बनाकर बेतूकी बातें मनवाते हैं। परीक्षा भी परिश्रम से पास करने के बजाए नक़ल करने के नए-नए तरीके ढूंढ रहे हैं। शिक्षकों के प्रति उनके मन में कोई सम्मान की भावना नहीं होती। वर्तमान समय में उपयुक्त करने के अलावे अनेक कारण हैं, जिससे आज विद्यार्थियों में अनुशासनहीनता दिखाई मिलती है।

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अनुशासनहीनता रोकने के उपाय

अनुशासनहीनता रोकने का पहला उपाय है-आत्मानुशासन में रहना। अगर मनुष्य अपने शासन में रहता है तो यह समस्या नहीं आती है। इसके अलावा छात्रों को नैतिक शिक्षा अवश्य दी जानी चाहिए। छात्रों के साथ मित्रवत व्यवहार करना, उनकी बातें सुनकर उनकी समस्या का निवारण करने से अनुशासनहीनता पूरी तरह से रोकी जा सकती है।

विद्यालय में एक आदर्श विद्यार्थी कहलाने के लिए अनुशासन का पालन बहुत ही आवश्यक है। इसके लिए विद्यालय के नियमों, अपने अध्यापक एवं प्रधानाचार्य की आज्ञा का पालन करना अत्यावश्यक हो जाता है। इतना ही नहीं, विद्यालय की संपत्ति को नुकसान न पहुँचाना और अपने आसपास साफ़-सफ़ाई रखना अनुशासन के ही अंग माने गये हैं। दुर्भाग्य से विद्यार्थी अनुशासनहीनता पर उतरकर अवांछनीय कार्यों में पूरी तरह से शामिल हो जाते हैं।

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आज की स्थिति

प्राचीनकाल में विद्यार्थी गुरुकुल में रहकर शिक्षा ही ग्रहण किया करते थे। वहाँ का वातावरण बडा अनुशासित होता था। विद्यार्थी अपने गुरुओं का पूरा सम्मान भी किया करते थे। वहाँ अमीर-गरीब, ऊँच-नीच का भेदभाव बिल्कुल भी न था। सभी विद्यार्थी इकट्ठे होकर एक ही गुरू के पास विद्या ग्रहण किया करते थे। भगवान् कृष्ण एवं सुदामा ने सदीपन ऋषि के आश्रम में इकट्ठे ही विद्या ग्रहण की। विद्यार्थी जीवन में अनुशासन के बिना सफल जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। आज भारत में जीवन के प्रत्येक पहलू में अनुशासनहीनता दृष्टिगोचर हो रही है। विद्यार्थी की रुचि पढ़ाई की ओर नहीं। कभी एक विश्वविद्यालय में तो कभी दूसरे विश्वविद्यालय, कभी एक परीक्षा केन्द्र में तो कभी दूसरे परीक्षा केन्द्र में हड़ताल, मारपीट आदि समाचार प्रतिदिन का विषय अधिकतर बने हुए हैं। अपनों से बड़ोंका आदर करना, उनका कहा मानना तो विद्यार्थी एकदम से भूलता ही जा रहा है। शारीरिक दण्ड न होने के कारण अनुशासनहीनता बहुत तेजी से बढ़ती ही जा रही है। परीक्षाएं तो आजकल अध्यापकों के लिए सिर दर्द बन कर रह गई हैं। नकल करना विद्यार्थी अपना पूर्ण अधिकार समझते हैं।

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कारण

  • विद्यार्थी जीवन के अनुशासनहीनता के अनेक कारण हैं- अनुशासनहीनता का पहला कारण माता-पिता की ढील होती है। पहले तो माता पिता प्यार के कारण बच्चों को कुछ नहीं कहते परन्तु जब हाथ से निकल जाते हैं तो बहुत ही पश्चाताप करते हैं।
  • आजकल विद्यार्थी पढ़ाई में रुचि बिल्कुल भी नहीं रखते। वे केवल साज शृंगार, सुख, आराम का इच्छुक पाते हैं। उन्हें अनुशासन में रहने के नियमों पर चलने को कहा जाता है तो वे अनुशासनहीनता का सहारा एकदम से ले लेते हैं।
  • विद्यार्थियों में अनुशासनहीनता का तीसरा कारण राजनीतिक पार्टियां होती हैं। राजनीतिक पार्टियां अपना स्वार्थ हल करने के लिए विद्यार्थियों में अनुशासनहीनता पूरी तरह से फैलाती हैं।
  • अध्यापक की अपनी कमजोरी भी इसका एक बहुत ही बड़ा कारण है। जब अध्यापक अपने विषय का पूरा ज्ञाता नहीं होता तो विद्यार्थी शीघ्र ही उनकी कमजोरी को भांप लेते हैं तथा अपनी पढ़ाई में रुचि बिल्कुल भी नहीं रखते हैं।

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उपसंहार

आपको यह भी बता दें कि विद्यार्थी जीवन एक अमूल्य हीरे के समान ही होता है। अगर इसे अनुशासित ढांचे में ढालोगे तो यह एक ओर चमक उठेगा। अनुशासन में रहकर ही जीवन की गाड़ी ठीक – ठाक ढंग से चलती है। अनुशासन केवल विद्यार्थी के लिए ही बहुत ही आवश्यक नहीं होता बल्कि प्रत्येक मानव एवं प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह अनिवार्य होता है। इससे समाज में शान्ति बनी रहती है एवं समाज समृद्धि की ओर एकदम से अग्रसर बना होता है।